Tuesday, March 3, 2009

हम नहीं सुधरेंगे

‘मैने कहा जग गए क्या........?’
अगर जग गए हों तो आपकी चाय बना दूँ.....!
यह हमारी श्रीमती जी का स्वर था ।जो सुबह सुबह आँखे खुलते ही हमारे कान भी खोल देता है। अब आप ही सोचिऐ सुबह-सुबह कोई आपकी चाय बनाने की कोशिश करेगा तो आफँसेंगे या रोऐगें।हमनेउन्हें कई बार समझाया कि कि भाग्यवान !आखिर किस जन्म का बैर निकालना चाहती हो हमारी चाय बना कर।कोई भला आदमी सुनेगा तो क्या कहेगा ?मगर नहीं साहब उनकी सेहत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला ।थोडी देर में श्रीमती जीने हाथ में चाय का कप थमाते हुए वही घिसे - पिटे शब्द दोहराते हुए कहा,‘‘लीजिए आपकी चाय” और हम चुपचापअपनी चाय पीने में ही खैरियत मनाते हैं। खैर साहब यह तो अर्थ के अनर्थ का एक नमूना मात्र है। कई बार हमारी हालत और भी पतली हो जाती है जब कि हम केरोसिन की पीपी दुकानदार के सामने रखते हैं और दुकान दार हमारी बारी आने पर बडी शालीनता से कहता है,“आपको इसमें डाल दूँ ?”वैसे सब्जी और फल वाले भी बाबूजी की टांग खीचने में पीछे नहीं रहते !आम वाला बड़े जोश से आवाज लगाता है बाबूजी लंगडा़,.......बाबूजी लंगडा़.......!हमनें उसे कई बार समझाया कि भैय्या, क्यों बाबू जी की ताँग तोडने पर तुले हो....?और वह ही ही कर बत्तीसी दिखादेगा बस....।जैसे हम बरसों से उसकी बत्तीसी देखने के लिऐ तरस रहे हों !केले वाला ,‘बाबू जी रुपये के आठ ’की आवाज लगाता है तो आलू वाला ,‘बाबूजी रुपये किलो ’का ऐलान करता घूमता है। अब हम उन्हें कहाँ तक समझाए कि भैय्या जी बाबू जी को इतना सस्ता मत आंको ,वरना लाला अपनी फेक्ट्री में रुपये के आठ बाबू लगा लेगा ...!मगर हमारी सुनता कौन है साहब.......! अभी कुछ ही दिन पूर्व की बात है हम गेंहूँ पिसवाने गये,कि एक सज्जन बडी जल्दी में थे और बोले,“सेठ्जी पहले मुझे पीस दो ।”हम चौके और धीरे से पूछा ,‘क्यॊ भैय्या जी ....क्याजिन्दगी से इतने परेशान हो गये जो यहाँ चक्की पर पिसने चले आये ।’वह खीजता हुआ बॊला ,‘आप नहीं समझेंगे ,मैं अपना पीपा पिसवाने आया हूँ ।’ हम बोले इस छोटी सी चक्की में आपका पीपा भला कैसे पिस सकता है.......?मेरे विचार से चक्की में गेंहूँ जरूर पिस सकता है।’ शायद श्रीमान जी को हमारी दखलन्दाजी पसंद नहीं आई।क्योंकि हम उनके तेंवर देख कर ही समझ गए थे इसलिए चुपचाप वहाँ से खिसकने में ही खैरियत थी । हम कई बार मोहल्ले- पडोस वालों के भी बडे काम आते हैं। क्योंकि छोटी-मोटी बीमारियों का इलाज हम मुफ्त में ही कर दिया करते हैं। मगर कई बार हम बडे संकट में पड़ जाते हैं जब कोई आकर कहता है ,‘सर मिटने की गोली होगी आपके पास॥?’हमनें उन्हें कई बार समझा दिया कि भैय्या जी क्यों बेचारे सर के पीछे पडे हो !यदि किसी के पेट में दर्द होगा तो आकर कहेगा पेट मिटने की दवा है॥?हम उन्हें कैसे समझाते भैय्या जी पेट ही मिट जाऐगा तो सारा चक्कर ही समाप्त हो जाऐगा। वैसे कुछ लोग हमारी इस तरह की टीका तिप्पणी से झल्ला भी जाते है। लेकिन हम उन्हें कैसे समझाऐ कि गलती पर हम नहीं वें स्वयं हैं। एक बार तो हद हो गई साहब । हमारे बहुत पुराने मित्र एक दिन दल-बल सहित हमारे घर पधारे।उनकी पत्नी और पुत्र से हम पहले से परिचित नहीं थे।अतः जिज्ञासा वश उनके साथ आए पाँच वर्षीय बालक की ओर इशारा करते हुए हमने पूछा,‘यह आपका बेटा है ॥?’ मित्र तपाक से बोला,‘आपका ही है.....।’खैर हमने बुरा नहीं माना जैसा उनका बच्चा वैसा हमारा॥!उनके साथ आई स्त्री के विषय में हमनें अनुमान लगाते हुए पूछा ,‘और यह आपकी पत्नी...........?’व तुरन्त गर्मजोशी से बोले,‘जी हाँ....जीहाँ......आपकी ही है.......!’ हम तुरन्त सतर्क हो गए। यह तो अच्छा था उस समय हमारी श्रीमती जी रसोई में व्यस्त थीं ।वरना....खैर छोडिये भी ...वैसे भी मै ऐसी मनहूस बातें नहीं सोचता॥।हमने सामान्य होने के लिए बालक से बात चलानी चाही,‘तो ये आपके मम्मी- पापा है.....?’मगर यह क्या वह तो उनसे भी चार कदम आगे था बोला,‘जी हाँ आपके ही हैं.....!’हम समझ गये कि बेटा बाप का भी बाप निकलेगा। अब आप ही बताएँकि हम भला किस किस को कहाँ तक सुधारें ?अब तो लगता शायद हमें ही सुधरना पडेगा। क्योंकि शायद इस तरह के लोगों नें तो कसम खाई कि हम नहीं सुधरेंगे ।वैसे भी हमें भी क्या पड़ी है किसीको सुधारने की॥?


डॉ योगेन्द्र मणि

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